बच्चे का पालन पोषण कैसे करें

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यहाँ हम जन्म होने तक और जन्म होने के बाद बच्चे का पालन पोषण कैसे करें इसके सर्वोत्तम तरीकों का वर्णन कर रहे हैं। माता-पिता को बच्चे का पालन-पोषण इस तरह करना चाहिए कि बच्चे का समग्र बहुआयामी विकास हो। हम एक बच्चे में सर्वोत्तम गुण और रचनात्मकता लाने के लिए समग्र बहु-आयामी विकास के लिए चरण-दर-चरण सर्वोत्तम तरीके दे रहे हैं।

गर्भाधान के समय

गर्भाधान के समय माता-पिता की मानसिक स्थिति बच्चे के भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए माता-पिता को इसका ख्याल रखना चाहिए। 

जन्म से पहले 9 महीने की अवधि के दौरान

हम महाभारत से अभिमन्यु की कहानी जानते हैं। अर्जुन सुभद्रा को बता रहे थे कि कैसे चक्रव्यूह में प्रवेश करना है, जब अभिमन्यु उसके पेट में था। इसके माध्यम से, वह बिना जन्म लिए भी चक्रव्यूह में प्रवेश करना जान सका था। इससे हम क्या समझें ?

तो, हम समझ सकते हैं कि गर्भाधान के बाद और जन्म तक, पारिवारिक वातावरण जन्म के बाद बच्चे की मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, यदि इस 9 महीने की अवधि के दौरान, परिवार में तनाव, कलह या उदासी बनी रहती है, तो उसके बाद पैदा होने वाला बच्चा गंभीर प्रकृति का होगा। लेकिन, अगर ख़ुशी और प्यार भरा माहौल है, तो बच्चे का स्वभाव खुशमिजाज होगा। इसी तरह अगर इस 9 महीने की अवधि के दौरान माँ डरावने धारावाहिक या धार्मिक धारावाहिक देखती है, तो यह सब जन्म के बाद उसी अनुसार बच्चे के भविष्य को प्रभावित करता हैl

जन्म के बाद पहले 6 महीनों के दौरान

सभी डॉक्टरों का कहना है कि जन्म के बाद पहले 6 महीनों के दौरान बच्चे को सिर्फ ब्रेस्ट फीडिंग (माँ का दूध) ही देनी चाहिए। इस दौरान गाय का दूध, फलों का रस आदि कोई अन्य पेय नहीं देना चाहिए। यह देखा गया है कि जिन बच्चों ने इस 6 महीने की अवधि में केवल स्तनपान कराया है, उनमें अन्य बच्चों की तुलना में अधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता होती हैl

6 महीने से 2 साल की उम्र के दौरान

6 महीने के बाद, हम बच्चे के लिए उपयुक्त अन्य चीजें दे सकते हैं। बोतल से दूध पिलाने से बचना चाहिए। जब बच्चा खुद खाने में सक्षम हो जाए, तो उसे अपना खाना दिया जाना चाहिए और उसे खुद खाने देना चाहिए। परिवार के अन्य सदस्य अलग बैठ सकते हैं और अपना भोजन स्वयं खा सकते हैं। बच्चा दूसरों को देखेगा और उसी तरह खुद खाने की कोशिश करेगा। वह कुछ खाना ख़राब कर सकता है और कुछ  गन्दगी फैला सकता है, लेकिन फिर भी वह खाना सीख रहा है और खुद खाने का आनंद ले रहा हैl

2 वर्ष से 6 वर्ष की आयु के दौरान

2 साल की उम्र के बाद बच्चे का पालन-पोषण कैसे करें, इसके लिए माता-पिता को अधिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए। 2 साल बाद रचनात्मकता का समय शुरू होता है। एक बच्चा हर चीज को आश्चर्य से देखता है क्योंकि उसके जीवन में सब कुछ नया होता है। प्रारंभ में उसे रंग, पेंसिल, रबड़ दिया जा सकता है और उसे इन चीजों के साथ कुछ भी करने दिया जा सकता है। उसे कागज बर्बाद करने दो, चिंता मत करो। इन चीजों के साथ काम करने से अध्ययन सामग्री के उपयोग की आदत आती है और बच्चे में रचनात्मकता आती है और स्कूल जाना आसान हो जाता है जहां उसे समान चीजें मिलेंगीl

इस उम्र का बच्चा हर चीज को उत्सुकता से देखता है। उसके कई सवाल हैं और वह अपने माता-पिता से पूछता है। कुछ माता-पिता बस इन सवालों को नजरअंदाज कर देते हैं। अनदेखा न करें, सभी प्रश्नों का उत्तर दें, भले ही वो बेमतलब के हों, अनुपयोगी हों। इससे बच्चे के दिमागी विकास में मदद मिलती हैl

अगर इस उम्र का बच्चा परिवार में अकेला बच्चा है और उसके साथ खेलने वाला कोई नहीं है, तो माता-पिता को उसके दोस्त बन जाना चाहिए और बच्चे की तरह उसके साथ खेलना चाहिएl

जब बच्चा किताबें पढ़ने या चित्रों को समझने में सक्षम हो जाए, तो उसे खुद पढ़ने के लिए कहानी पत्रिकाएं और किताबें जैसे टिंकल, मैजिक पॉट, चंपक आदि दें। रोज सोने के समय पढ़ने की आदत विकसित की जा सकती है। इससे बच्चे में किताब पढ़ने की आदत विकसित होती है और उसकी शब्दावली में सुधार होता है जो उसे भविष्य में मदद करेगाl

माँ को छोटे बच्चों के लिए गीत गाना चाहिए जिसे हम हिंदी में “लोरी” कहते हैं। साथ ही माता-पिता को चाहिए कि वे सोते समय बड़े बच्चों को प्रेरक कहानियां सुनाएं। यह न केवल अच्छी नींद में मदद करेगा बल्कि बच्चे में नैतिक मूल्यों के विकास में भी मदद करेगाl

6-12 वर्ष की आयु के दौरान

इस उम्र के बच्चे सब कुछ समझने में सक्षम हो जाते हैं। माता-पिता को चाहिए कि ऐसे बच्चों को आउटडोर गेम्स खेलने दें और अलग-अलग लोगों से मिलवायें । उन्हें किराने का सामान या सब्जियां खरीदने के लिए पास के बाजार में भेजा जा सकता है। यह सब चीजों को सीखने में मदद करता है, आत्मविश्वास और सक्रियता लाता हैl

माता-पिता को ऐसी उम्र के बच्चे का ध्यानपूर्वक पालन-पोषण करना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस उम्र के बच्चे अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। उनके साथ ठीक से व्यवहार करना चाहिए। माता-पिता को अपने बच्चों का सम्मान करना चाहिए, तभी वे बच्चों से सम्मान की उम्मीद कर सकते हैं। उन्हें बच्चों से सब कुछ धैर्यपूर्वक सुनना चाहिए, चाहे वह प्रासंगिक हो या नहींl

माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों की गलतियों पर नाराज न हों, बल्कि उन्हें गलतियों के बारे में शांतिपूर्वक समझाएं। उन्हें बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करना चाहिए। उन्हें कभी भी बच्चों के प्रदर्शन की तुलना दूसरे बच्चों के प्रदर्शन से नहीं करनी चाहिए। बल्कि अपने पिछले प्रदर्शन से तुलना की जानी चाहिए और भविष्य में बेहतर प्रयासों के लिए प्रेरणा दी जानी चाहिएl

जल्दी सोने की आदत विकसित की जा सकती है। समय से पहले अच्छी नींद मस्तिष्क के विकास और बच्चे के विकास में भी मदद करती है। हम सभी जानते हैं कि “Early to bed and early to rise, makes a man healthy, wealthy and wise” (जल्दी सोना और जल्दी उठना मनुष्य को स्वस्थ, धनी और बुद्धिमान बनाता है)। यह ऐसी आदत के विकास का समय है। इस उम्र के बच्चों को ब्राइट माइंड्स प्रोग्राम जैसे मस्तिष्क और कौशल सुधार के कुछ पाठ्यक्रम से जोड़ा जा सकता हैl

12-18 वर्ष की आयु के दौरान

हर बच्चे की पढ़ाई में रुचि नहीं हो सकती है। हम सभी इस कहावत को जानते हैं, “All work and no play makes Jack a dull boy” इसलिए जबरदस्ती पढ़ाई करने का दबाव नहीं बनाना चाहिए। इसके बजाय, माता-पिता को उनकी रुचि जानने और रुचि की चीजें सीखने में उनकी मदद करनी चाहिए। कुछ बच्चे अच्छे गायक, कुछ कलाकार या खिलाड़ी हो सकते हैं। उन्हें अपनी प्रतिभा विकसित करने दें। लगन से पढ़ाई करने वालों को भी बोर होने पर टाइम पास के लिए कोई न कोई शौक जरूर रखना चाहिए। माता-पिता को इस संबंध में मदद करनी चाहिए।

माता-पिता को स्वयं परिवार में वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा वे अपने बच्चों से चाहते हैं। उन्हें खुद ज्यादा टीवी देखने या मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने से बचना चाहिए। उन्हें एक खुशनुमा पारिवारिक वातावरण रखना चाहिए और बच्चों के दोस्त बन जाना चाहिए ताकि वे सब कुछ और हर समस्या साझा कर सकें। उन्हें आध्यात्मिक कहानियाँ सुनाएँ और उन्हें योग और ध्यान जैसी चीज़ों के लिए कुछ समय देने के लिए प्रेरित करें। इससे बच्चों को तनाव मुक्त और तरोताज़ा रहने में मदद मिलेगी। इससे उन्हें अपने काम पर ध्यान और एकाग्रता बढ़ाने और जीवन के हर पहलू में अपने प्रदर्शन में सुधार करने में भी मदद मिलेगीl

तो, सारांश यह है कि माता-पिता बच्चों को इस दुनिया में लाए हैं और इसलिए, बच्चे का पालन पोषण कैसे करें, यह उनके जीवन का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य होना चाहिएl यह उनकाकर्तव्य है कि बच्चे का सर्वोत्तम संभव तरीके से पालन-पोषण करें ताकि वे एक अच्छे इंसान बन सकें।

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